10+ Most Popular Harivansh rai bachchan poems in hindi

हरिवंश राय बच्चन हिंदी साहित्य से एक महान लेखक और कवि थे। उन्हें उत्तरी हिंदी साहित्य के मुख्य कवियों में से एक माना जाता है। हिंदी में (Harivansh rai bachchan poems in hindi / famous poems of harivansh rai bachchan) हिंदी साहित्य बहुत प्रसिद्ध है। मधुशाला कविता और अग्नेपुथ कविता (jo beet gayi so beet gayi poem/agnipath poem ) नामक संरचना सबसे प्रसिद्ध बन गई है।

आज यहाँ पर आपको हरिवंशराय बच्चन की कविताए harivansh rai bachchan hindi poems, harivansh rai bachchan poetry आपको बताने वाला हु जो हरिवंश राय बच्चन के समय में भी फेमस थी और आज भी है।

Harivansh Rai Bachchan Quotes

कभी फूलो की तरह मत जीना अगर जीना है तो पत्थर की तरह जिओ किसी दिन तरसे बनोगे तो खुदा बन जाओगे।

Harivansh Ray Bachchan Poems in Hindi
Harivansh Ray Bachchan Poems in Hindi


तू न थकेगा कभी, तू न थमेगा कभी तू न मुड़ेगा कभी। कर शपथ! कर शपथ! कर शपथ! अग्निपथ! अग्निपथ! अग्निपथ!

harivansh rai bachchan poems
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एक अपनी शांति की कुटिया बनाना कब माना है? है अँधेरी रात पर दिया जलना कब माना है?

harivansh rai bachchan poem in hindi
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मधुर प्रतीक्षा ही जब इतनी, प्रिये तुम आते तब क्या होता।

हरिवंश राय बच्चन कविता
हरिवंश राय बच्चन कविता


ये बुरा है अच्छा व्यर्थ दिन इस पर बिताना, अब अशम्भव छोड़ ये पथ, दूसरे पर पग बढ़ाना।

harivansh rai bachchan poems
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Harivansh Rai Bachchan Poems in Hindi ( हरिवंश राय बच्चन की कविताएँ हिंदी में ):-

1. ✍🏻अग्निपथ कविता (Agneepath poem/Agnipath poem)✍🏻 Harivansh Rai Bachchan Poem

वृक्ष हों भले खड़े,
हों घने हों बड़े,
एक पत्र छाँह भी,
माँग मत, माँग मत, माँग मत,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।


तू न थकेगा कभी, तू न रुकेगा कभी,
तू न मुड़ेगा कभी,
कर शपथ, कर शपथ, कर शपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

यह महान दृश्य है,
चल रहा मनुष्य है,
अश्रु श्वेत रक्त से,
लथपथ लथपथ लथपथ,
अग्निपथ अग्निपथ अग्निपथ।

2. ✍🏻जो बीत गई सो बात गई ( jo beet gayi so beet gayi )✍🏻 Harivansh Rai Bachchan Poem

जीवन में एक सितारा था
माना वह बेहद प्यारा था
वह डूब गया तो डूब गया
अंबर के आंगन को देखो
कितने इसके तारे टूटे
कितने इसके प्यारे छूटे
जो छूट गए फिर कहाँ मिले
पर बोलो टूटे तारों पर
कब अंबर शोक मनाता है
जो बीत गई सो बात गई


जीवन में वह था एक कुसुम
थे उस पर नित्य निछावर तुम
वह सूख गया तो सूख गया
मधुबन की छाती को देखो
सूखीं कितनी इसकी कलियाँ
मुरझाईं कितनी वल्लरियाँ
जो मुरझाईं फिर कहाँ खिलीं
पर बोलो सूखे फूलों पर
कब मधुबन शोर मचाता है


जो बीत गई सो बात गई
जीवन में मधु का प्याला था
तुमने तन मन दे डाला था
वह टूट गया तो टूट गया


मदिरालय का आँगन देखो
कितने प्याले हिल जाते हैं
गिर मिट्टी में मिल जाते हैं
जो गिरते हैं कब उठते हैं
पर बोलो टूटे प्यालों पर
कब मदिरालय पछताता है
जो बीत गई सो बात गई


मृदु मिट्टी के बने हुए
मधु घट फूटा ही करते हैं
लघु जीवन ले कर आए हैं
प्याले टूटा ही करते हैं
फ़िर भी मदिरालय के अन्दर
मधु के घट हैं, मधु प्याले हैं
जो मादकता के मारे हैं
वे मधु लूटा ही करते हैं
वह कच्चा पीने वाला है
जिसकी ममता घट प्यालों पर
जो सच्चे मधु से जला हुआ
कब रोता है चिल्लाता है
जो बीत गई सो बात गई

3. ✍🏻मैंने मान ली तब हार!✍🏻 Harivansh Rai Bachchan Poem

पूर्ण कर विश्वास जिसपर,
हाथ मैं जिसका पकड़कर,
था चला, जब शत्रु बन बैठा हृदय का गीत,
मैंने मान ली तब हार!

विश्व ने बातें चतुर कर,
चित्त जब उसका लिया हर,
मैं रिझा जिसको न पाया गा सरल मधुगीत,
मैंने मान ली तब हार!

विश्व ने कंचन दिखाकर
कर लिया अधिकार उसपर,
मैं जिसे निज प्राण देकर भी न पाया जीत,
मैंने मान ली तब हार!

4. ✍🏻दुखी-मन से कुछ भी न कहो!✍🏻 Harivansh Rai Bachchan Poem

व्यर्थ उसे है ज्ञान सिखाना,
व्यर्थ उसे दर्शन समझाना,
उसके दुख से दुखी नहीं हो तो बस दूर रहो!
दुखी-मन से कुछ भी न कहो!

उसके नयनों का जल खारा,
है गंगा की निर्मल धारा,
पावन कर देगी तन-मन को क्षण भर साथ बहो!
दुखी-मन से कुछ भी न कहो!

देन बड़ी सबसे यह विधि की,
है समता इससे किस निधि की?
दुखी दुखी को कहो, भूल कर उसे न दीन कहो?
दुखी-मन से कुछ भी न कहो!

5. ✍🏻आ रही रवि की सवारी✍🏻 Harivansh Rai Bachchan Poem

आ रही रवि की सवारी।
नव-किरण का रथ सजा है,
कलि-कुसुम से पथ सजा है,
बादलों-से अनुचरों ने स्‍वर्ण की पोशाक धारी।
आ रही रवि की सवारी।
विहग, बंदी और चारण,
गा रही है कीर्ति-गायन,
छोड़कर मैदान भागी, तारकों की फ़ौज सारी।
आ रही रवि की सवारी।
चाहता, उछलूँ विजय कह,
पर ठिठकता देखकर यह-
रात का राजा खड़ा है, राह में बनकर भिखारी।
आ रही रवि की सवारी।

6. ✍🏻था तुम्हें मैंने रुलाया✍🏻 Harivansh Rai Bachchan Poem

हा, तुम्हारी मृदुल इच्छा!
हाय, मेरी कटु अनिच्छा!
था बहुत माँगा ना तुमने किन्तु वह भी दे ना पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!


स्नेह का वह कण तरल था,
मधु न था, न सुधा-गरल था,
एक क्षण को भी, सरलते, क्यों समझ तुमको न पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!


बूँद कल की आज सागर,
सोचता हूँ बैठ तट पर –
क्यों अभी तक डूब इसमें कर न अपना अंत पाया!
था तुम्हें मैंने रुलाया!

7. ✍🏻दिन जल्दी-जल्दी ढलता है✍🏻 Harivansh Rai Bachchan Poem

हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं –
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!


बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे –
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!


मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल? –
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

8. ✍🏻क्षण भर को क्यों प्यार किया था✍🏻 Harivansh Rai Bachchan Poem

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर,
पलक संपुटों में मदिरा भर,
तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था?
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
‘यह अधिकार कहाँ से लाया!’
और न कुछ मैं कहने पाया –
मेरे अधरों पर निज अधरों का तुमने रख भार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?
वह क्षण अमर हुआ जीवन में,
आज राग जो उठता मन में –
यह प्रतिध्वनि उसकी जो उर में तुमने भर उद्गार दिया था!
क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

9. ✍🏻दिन जल्दी-जल्दी ढलता है✍🏻 Harivansh Rai Bachchan Poem

हो जाय न पथ में रात कहीं,
मंजिल भी तो है दूर नहीं –
यह सोच थका दिन का पंथी भी जल्दी-जल्दी चलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!


बच्चे प्रत्याशा में होंगे,
नीड़ों से झाँक रहे होंगे –
यह ध्यान परों में चिड़ियों के भरता कितनी चंचलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!


मुझसे मिलने को कौन विकल?
मैं होऊँ किसके हित चंचल? –
यह प्रश्न शिथिल करता पद को, भरता उर में विह्वलता है!
दिन जल्दी-जल्दी ढलता है!

10. ✍🏻ओ गगन के जगमगाते दीप!✍🏻 Harivansh Rai Bachchan Poem

दीन जीवन के दुलारे
खो गये जो स्वप्न सारे,
ला सकोगे क्या उन्हें फिर खोज हृदय समीप?
ओ गगन के जगमगाते दीप!

यदि न मेरे स्वप्न पाते,
क्यों नहीं तुम खोज लाते
वह घड़ी चिर शान्ति दे जो पहुँच प्राण समीप?
ओ गगन के जगमगाते दीप!

यदि न वह भी मिल रही है,
है कठिन पाना-सही है,
नींद को ही क्यों न लाते खींच पलक समीप?
ओ गगन के जगमगाते दीप!

11. ✍🏻मैं जीवन में कुछ न कर सका!✍🏻 Harivansh Rai Bachchan Poem

जग में अँधियारा छाया था,
मैं ज्वाला लेकर आया था
मैंने जलकर दी आयु बिता, पर जगती का तम हर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

अपनी ही आग बुझा लेता,
तो जी को धैर्य बँधा देता,
मधु का सागर लहराता था, लघु प्याला भी मैं भर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

बीता अवसर क्या आएगा,
मन जीवन भर पछताएगा,
मरना तो होगा ही मुझको, जब मरना था तब मर न सका!
मैं जीवन में कुछ न कर सका!

12. ✍🏻क्या करू संवेदना लेकर तुम्हारी✍🏻Harivansh Rai Bachchan Poem

मुख्य दुखी जाब हुवा,
सामवेद आपको दिखाता है
मुख्य कृतग्य हुआ हमशा,
रीत दोनो ने निबही

किंटू इस्स अबार का है,
हो चुक्का है बोझा भारी
किया कुरु समवेदना लेकर तुमहारी
क्या करें

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मेरा नाम विकी है। में इसी तरह की हिंदी कहानिया , हिंदी चुटकुले और सोशल मीडिया से संबंधित आर्टिकल लिखता हु। यह आर्टिकल “10+ Most Popular Harivansh rai bachchan poems in hindi” अगर आपको पसंद आया हो तो अपने दोस्तों के साथ शेयर करे और हमे फेसबुकइंस्टाग्रामट्विटर आदि में फॉलो करे।

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