Rahim Das Dohe and Biography in Hindi

रहीम मध्यकालीन सामंतवादी संस्कृति के प्रेमी कवि थे। रहीम का व्यक्तित्व बहुमुखी और प्रतिभा-सम्पन्न था। वे एक ही साथ सेनापति, प्रशासक, आश्रयदाता, दानवीर, कूटनीतिग्नय, बहुभाषविद, कलाप्रेमी, कवि और एवं विद्वान थे।

रहीम सम्प्रदाय सद्भाव तथा सभी संप्रदायों के प्रति समादर भाव से सत्यनिष्ठ साधक थे। वे भारतीय सामासिक संस्कृति के अनन्य आराधक थे। रहीम कलम और तलवार के धनी थे और मानव प्रेम के सूत्रधार थे।

Rahim Das (Abdul Rahim Khan-i-Khana) Biography, Dohe, and Poetry in Hindi| रहीम दास की जीवनी, दोहे और रचनाएँ

बिंदु (Points)जानकारी (Information)
नाम रहीम दास
पूरा नाम अब्दुल रहीम खाँ-ए-खाना
पिता का नाम बैरम खान
माता का नाम सईदा बेगम
जन्म 17 दिसम्बर, 1556
जन्म स्थान लाहौर
मृत्यु वर्ष 1627
उपलब्धि अकबर के नवरत्न
Brief information about Rahim Das

रहीम दस का जीवन परिचय | Biography of Rahim Das

अबदुर्ररहीम खानखना का जन्म इ.स. 1613 में यानी की सन 1553 में इतिहास प्रसिद्ध बैरम खा के घर लाहौर में हुआ था। संयोग से उस समय प्रसिद्ध सम्राट हुमायूँ सिकंदर सूरी का आक्रमण का प्रतिरोध करने के लिए सैन्य के साथ लाहौर में मौजूद थे।

बैरम खा के घर पुत्र की उत्पति की ख़बर सुनकर वे स्वयं वहाँ गए और उस बच्चे का नाम “रहीम”। अकबर ने रहीम का पालन-पोषण एकदम धर्म पुत्र की भाँति किया।

कुछ दिनो बात अकबर ने विधवा सुल्तान बेगम से विवाह कर लिया। अकबर ने रहीम को सही ख़ानदान के अनुरूप “मिर्ज़ा खाँ” की उपाधि से सम्मानित किया।

रहीम की शिक्षा-दीक्षा अकबर की उदार धर्म -निरपेक्ष नीति के अनुकूल हुई। इसी शिक्षा-दीक्षा के कारण रहीम का काव्या आज भी हिंदुओ के गले का कंठहर बना हुआ है। दिनकर जी के कथानुसार अकबर ने अपने दिन-इलाही में हिंदुत्व को जो स्थान दिया होगा उससे कई ज़्यादा गुना स्थान रहीम ने अपनी कविताओं में दिया।

रहीम के बारे में यह कहा जाता है की वह धर्म से मुसलमान और संस्कृति से शुद्ध भारतीय थे। रहीम की शिक्षा पूर्ण होने के बाद सम्राट अकबर ने उनके पिता हुमायूँ की परम्परा का निर्वाह करते हुए, रहीम का विवाह बैरम खा के विरोधी मिर्ज़ा अज़ीज़ कोक की बहन माह्बनो से करवा दिया। रहीम का विवाह 16 साल की उम्र में कर दिया गया था।

अकबर के नवरत्नों में से एक – रहीम

अकबर के दरबार को प्रमुख पड़ो में से एक मीर अर्ज़ का पद था। यह पद पाकर कोई भी व्यक्ति रातों-रात आमिर हो जाता था, क्योंकि यह पद ऐसा था, जिससे पहुँच कर हाई जनता की फ़रियाद सम्राट तक पहुँचायी जाती थी और सम्राट के द्वारा लिए गये फ़ैसले इसी पद के ज़रिए जनता तक पहुँचाए जाते थे। इस पद पर हर दो-तीन दिन में नए लोगों की भर्ती हो जाती थी। सम्राट अकबर ने इस पद का काम-काज सुचारु रूप से चलने के लिए अपने सच्चे और विश्वास पात्र आमिर रहीम को मुस्ताकिल मीर अर्ज़ नियुक्त किया।

यह निर्णय सुन कर सारा दरबार सन्न रह गया। इस पद पर असिन होने का मतलब था की यह व्यक्ति जनता एवं महाराज दोनो की और से विश्वासनीय है।

रहीम दास के दोहे और कवितायें | Rahim das ke dohe aur Kavitaye

रहीम ने अवधी और बज्रभाषा दोनो में हाई कविता की है जो सरल और स्वाभाविक और महत्वपूर्ण है। उनके काव्य में शृंगार, शांति तथा हाशय राश मिलते है और दोहा, सोरठा, बरवै, कवित और सवैया उनके प्रिया छंद थे।

मुस्लिम धर्म के अन्यायों होते हुए भी रहीम ने अपनी काव्या रचना द्वारा हिन्फ़ी साहित्य की जो सेवा कि उसकी मिसाल विरले की मिल सकेगी रहीम जी की कई रचनए प्रसिद्ध है जिन्हें उन्होंने दोहो के रूप में लिखा।

इन दोहो में नीति परक का विशेष स्थान है। रहीम के ग्रंथो में रहीम दोहवाली या सतसई, बरवै, नायिका भेद, शृंगार, सोरठा, मदनशतक, राग पंचाध्यायी, नगर शोभा, फूटकर बरवै, फूटकर छंद तथा पद, फूटकर कवित्व, सवैये, संस्कृति काव्य सभी प्रसिद्ध है।

उन्होंने तुर्की भाषा में लिखी बाबर की आत्मकथा “तूजके बाबरी” का फ़ारसी में अनुवाद किया। “मआसिरे रहीमी” और “आइने अकबरी ” में इन्होंने “खानखना” व रहीम नाम से कविता है।

रहीम जी का व्यक्तित्व बहुत प्रभावशाली था। यह मुसलमान हो कर भी कृष्णा भक्त थे। इन्होंने खुद को “रहिमन ” कहकर भी सम्बोधित किया है। इनके काव्य में नीति, भक्ति, प्रेम, और शृंगार का सुंदर समावेश मिलता है। उनकी कवितायें, छंदो, दोहो में पूर्वी अवधी, बज़्रभाषा और खाड़ी बोली का प्रयोग किया गया है।

भाषा को सरल, सरस व मधुर बनने के लिए इन्होंने तदभव शब्दों का अधिक प्रयोग किया है।

रहीम दस के सबसे प्रसिद्ध दोहे | Famous Rahim ke Dohe

Rahim Das ke Dohe
Rahim Das ke Dohe

रहीम पानी रखिए, बिन पानी के सब सुना। पानी गए न उबरे, मोती, मानुष, चुना।।

रहिमान धागा प्रेम का, मत तोरों चटकाय। टूटे पे फिरसे ना ज़रे,ज़रे गठ पारी जाय।

रहिमान निज मन की बिठा, मन हाई रखो गोय। सुनी उथलैहे मोग सब, बाँटी न लैहे कोय।।

जो रहीम उत्तम प्रकृति, का करी सकट कुसंग। चंदन विश व्याप्त नहीं, लापते राहत भुजंग।।

बिगड़ी बात बने नहीं, लाख करो किन कोय। रहिमान फटे दूध कोम माथे न माखन होय।

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